Tuesday, 23 January 2018
ध्रुव तारा बनी तारा दूसरों के लिए
ये कहानियां जो आपके सामने रखी जा रही है। ये सभी महिलाओं के संघर्ष की हैं। ये कहानियां बेहद आम महिलाओं की हैं। इनके पास न तो बड़ी डिग्री है और ना ही बहुत सा पैसा या अनुभव। ये सीधी-सादी सी सफलता की कहानियां आपको प्रेरित करें और सफलता की राह दिखाएं यही आशा है।
ये कहानी है बड़वानी की। स्व-सहायता समूह से जुड़ते ही उसकी मेहनत को सकारात्मक दिशा मिल गई। आज वह अपने घर पर छोटी सी मनिहारी की दुकान एवं सिलाई मशीन से कपड़े सिलकर जहां 5 सदस्यीय परिवार का गुजर-बसर अच्छी तरह से कर रही है। वही अपने पति को भी मोटर सायकिल दिलवा दी है। जिससे अब उसके सिले हुए कपड़े आस-पास के ग्रामो में भी पहुंचकर उसकी मेहनत को नई मंजिल की ओर ले जा रहे है।
हम बात कर रहे है बड़वानी की भिलखेड़ा बसाहट स्थल पर रहने वाली श्रीमती तारा कोचले की जिन्होने अपने नाम तारा को सार्थक करते हुए ध्रुव तारा के समान उस मुकाम पर स्थापित हो गई जहां से अब वे दूसरी महिलाओ को प्रोत्साहित कर उन्हे मंजिल की दिशा दिखाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रही है।
कुछ वर्षो पूर्व तक श्रीमती कोचले भी एक आम महिला जैसी थी, जो ठेले पर फेरी लगाकर मनिहारी (चूड़ी, कंगन, बिंदी-झुमके) का सामान बेचने वाले अपने पति की सीमित आय पर अपने तीन बच्चो की परवरिश के लिए संघर्ष करती थी। किन्तु जब से वे ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी, उनकी किस्मत बदल गई। आजीविका मिशन समूह के माध्यम से तीन बार मिले ऋण से आज जहां उन्होने अपनी कच्ची झोपड़ी को पक्का मकान में बदल दिया है। वही इस घर में पक्की दुकान पर बैठक सफलता पूर्वक अपनी मनिहारी की दुकान का संचालन करते हुए लेडिज कपड़ों को भी सिलने एवं बेचने का कार्य कर रही है। उनके इस कार्य में अब पति भी अपना हाथ बंटा रहे है। पत्नी के सिले हुए कपड़ों को वे अपनी मोटर सायकल से ले जाकर गांव-गांव फेरी लगाकर एवं हाट-बाजार में विक्रय कर रहे है। जिसके कारण उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हो रहा है।
पति-पत्नी की इस मेहनत से मिली सफलता को बच्चे भी अच्छी तरह से निभा रहे है। बड़ी पुत्री जहां एम.एस.सी कर रही है, तो छोटी पुत्री बी.एस.सी तो पुत्र ११वीं में पढ़ रहा है।
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