Wednesday, 3 October 2018

रितु पाटीदार खेती के साथ कर रही हैं पशुपालन

मंदसौर/ ग्राम नीनोरा जिला मंदसौर की रहने वाली शांति बाई खेती का कार्य बहुत अच्छे से कर लेती है। श्रीमती रितु बाई से चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि हमारे पास खेती भी हैं। जिसमें हम लोग सोयाबीन, मक्का, लहसुन, प्याज, उड़द, मूंग, गेहूं जैसी फसलें लगाते हैं। हमारे पास पहले देसी गाय थी। जो बहुत कम दूध देती थी। हमारे पास अच्छी नस्ल की गाय नहीं थी। लेकिन नाबार्ड के स्व सहायता समूह के माध्यम से हमें 50 हजार की राशि मिली और उस राशि से हम दो गाय खरीद कर लाए। हमारे पास में एक गाय जर्सी एवं दूसरी एचएफ नस्ल की गाय हैं। जोकि दूध देने में बहुत अच्छी हैं। हमारे पास पहले जो गाय थी उनको चराने के लिए भी जंगल में ले जाना पड़ता था। देशी नस्ल की गाय घर पर बेठी बेठी कम दूध देती थी लेकिन जर्सी एवं एचएफ नस्ल की गाय लाने से हमको अनेक फायदे हुए जिसमें यह गाय घर पर बेठी बेठी ज्यादा दूध देती है। इन गायो को चराने के लिये भी नहीं जाना पडता है। इनकी दूध देने की क्षमता भी अधिक है यह गाय 1 दिन में कम से कम 10 लीटर दूध देती है। इन गायो से जो दूध प्राप्त होता है वह दूध हम महिला दुग्ध सहकारी समिति को देते हैं। यह दूध हम 30 से 35 रू प्रति लीटर की दर पर बेचते हैं। जिससे हम को महीने में 5 हजार की अतिरिक्त आय हो जाती हैं।

Saturday, 10 February 2018

सारिका की सफलता की कहानी

ये कहानियों जो आपके सामने रखी जा रही है। ये सभी महिलाओं के संघर्ष की हैं। ये कहानियां बेहद आम महिलाओं की हैं। इनके पास न तो बड़ी डिग्री है और ना ही बहुत सा पैसा या अनुभव। ये सीधी-सादी सी सफलता की कहानियां आपको प्रेरित करें और सफलता की राह दिखाएं यही आशा है।
मु यमंत्री युवा उद्यमी योजना से देवास की सारिका चंद्रात्रे के जीवन में खुशहाली के रंग नुमाया हो गए हैं। इस योजना से जुड़कर आज वे सफल उद्यमी हो गई है। देवास शहर की सारिका पति अजय चन्द्रात्रे गायत्री विहार कालोनी की गृहणी है। जिला अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति मर्यादित देवास में ष्ष्कलर उद्यमष् के लिये मु यमंत्री युवा उद्यमी योजना के अंतर्गत आवेदन किया था। तब तो यह नहीं कहा जा सकता था कि वह औद्योगिक क्षेत्र में 6.7 लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाकर पुरूषों के बराबर खड़ी रह पायेंगी। लेकिन सारिका चन्द्रात्रे उन महिलाओं में से एक थी जो कि अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर ष्ष्कलर उद्यमष् में सफलता अर्जित कर रहीं हैं।
दूसरों को दे रही हैं का सारिका ने बताया कि वह दो बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रही हैं तथा पति के सहयोग से कार्यकर 15 प्रतिशत मार्जिन रोजगार में प्राप्त हो रहा हैंए जो 6.7 कामगारों का वेतन एवं अन्य खर्च के बाद प्राप्त होता हैं। उन्होंने बताया कि वे कलर बनाने के साथ ही वाल पुट्टी का काम भी करते हैं तथा उनके द्वारा बनाये गये कलर कई प्रसिद्ध क पनियों के कलर के बराबर खरीदें जाते हैं। जो कोई भी उनके द्वारा बनाये गये कलर एक बार लेता या उपयोग करता हैं। उसकी मांग दूसरी बार भी होती हैं।
कारोबार को और बढ़ाएंगे उद्यमी सारिका ने बताया कि अब वे इस कारोबार को बडे स्तर पर ले जाना चाहते हैं। उन्होंने अभी पंजाब नेशनल बैंक औद्योगिक शाखा देवास से 25 लाख रुपए का ऋण लिया हैंए उसे शीघ्र ही जमाकर एक करोड़ रुपए का ऋण लेंगे।
मुख़्यमंत्री को दे रहे हैं धन्यवाद उद्यमी सारिका ने कहा मु यमंत्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा संचालित मुख़्यमंत्री युवा उद्यमी योजनाष् उनके लिए वरदान साबित हुई है। इस योजना का लाभ लेने के बाद उनका जीवन खुशनुमा हो गया है। इसके लिये वे सदा मुख़्यमंत्री जी को हृदय से धन्यवाद देंगी।

रजनी भटनागर के जीवन मे आया सकारात्मक बदलाव

अलीराजपुर। केन्द्र एवं राच्य शासन द्वारा महिलाओं को स्वावलम्बी तथा आत्म निर्भर बनाने के लिए कई योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इन योजनओं का लाभ लेकर महिलाएं अपने परिवार का जीवन स्तर ऊंचा उठा रही है और अपने बच्चों का भविष्य भी उच्जवल बना रही है। अलीराजपुर की रहने वाली श्रीमति रजनी गिरीश भटनागर का जीवन भी इसी तरह का है। श्रीमति रजनी भटनागर की आर्थिक स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी। उनके पास स्वंय का कोई मकान भी नहीं था। किराये के मकान मे रहती थी। उनके २ पुत्र धनन्दजय तथा पार्थ मिलाकर परिवार में कुल चार सदस्य है। उनके पति पेंटिग, वाल पेंटिग, रिडियम का कार्य करते थे। एन.जी.ओ. मे प्रशिक्षण देने का इनका मुख्य कार्य था। सृजनात्मक संचार के क्षैत्र में काम किया। इतना ही नहीं उन्होंने वाटर शेड में भी काम किया। उन्हें माह में ब$डी मुश्किल से १० से १२ हजार रुपये तक की आय हो जाती थी। आज के भौतिक परिवार का खर्च चलाने में काफी कठिनाईता का समाना करना प$डता है। उन्होंने उद्योग विभाग से सम्पर्क किया और प्रधानमंत्री (ग्रामीण) स्वरोजगार योजना के अंतर्गत बैंक ऑफ बडौदा शाखा चन्द्रशेखर आजाद नगर में आवेदन प्रस्तुत किया। बैक द्वारा फ्लेक्स बनाने की मशीन के लिए १० लाख रुपये का ऋण प्रदाय किया गया ओर शासन द्वारा इस पर ३ लाख ५० हजार रुपये का अनुदान लाभ भी प्रदाय किया गया। उन्होंने इस ऋण राशि से फ्लेक्स मशीन, फर्नीचर, कम्प्यूटर, एल्युमिनियम सेक्सन, लेपटॉप इत्यादि की व्यवस्था की। उनका यह व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा है। वे प्रतिमाह १५ हजार रुपये की किश्त पिछले डे$ढ साल से लगातार बैंक में जमा कर रहे है। इतना ही नहीं उन्होंने ४.२५ लाख रुपये में अल्टो वाहन भी खरीदा है। इस वाहन की ७ हजार रुपये की प्रतिमाह किश्त बैंक में चुका रहे है। उनका फ्लेक्स बनाने का करोबार बहुत अच्छा चल रहा है। इसके फलस्वरुप घर का खर्चा व किश्ते आसानी से निकल जाती है। श्रीमति रजनी भटनागर ने बताया कि धीरे-धीरे स्वंय का मकान भी बना लेंगे। अब वें इस व्यवसाय से पूरी तरह संतुष्ट है।

Tuesday, 23 January 2018

ध्रुव तारा बनी तारा दूसरों के लिए

ये कहानियां जो आपके सामने रखी जा रही है। ये सभी महिलाओं के संघर्ष की हैं। ये कहानियां बेहद आम महिलाओं की हैं। इनके पास न तो बड़ी डिग्री है और ना ही बहुत सा पैसा या अनुभव। ये सीधी-सादी सी सफलता की कहानियां आपको प्रेरित करें और सफलता की राह दिखाएं यही आशा है।
ये कहानी है बड़वानी की। स्व-सहायता समूह से जुड़ते ही उसकी मेहनत को सकारात्मक दिशा मिल गई। आज वह अपने घर पर छोटी सी मनिहारी की दुकान एवं सिलाई मशीन से कपड़े सिलकर जहां 5 सदस्यीय परिवार का गुजर-बसर अच्छी तरह से कर रही है। वही अपने पति को भी मोटर सायकिल दिलवा दी है। जिससे अब उसके सिले हुए कपड़े आस-पास के ग्रामो में भी पहुंचकर उसकी मेहनत को नई मंजिल की ओर ले जा रहे है।
हम बात कर रहे है बड़वानी की भिलखेड़ा बसाहट स्थल पर रहने वाली श्रीमती तारा कोचले की जिन्होने अपने नाम तारा को सार्थक करते हुए ध्रुव तारा के समान उस मुकाम पर स्थापित हो गई जहां से अब वे दूसरी महिलाओ को प्रोत्साहित कर उन्हे मंजिल की दिशा दिखाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रही है।
कुछ वर्षो पूर्व तक श्रीमती कोचले भी एक आम महिला जैसी थी, जो ठेले पर फेरी लगाकर मनिहारी (चूड़ी, कंगन, बिंदी-झुमके) का सामान बेचने वाले अपने पति की सीमित आय पर अपने तीन बच्चो की परवरिश के लिए संघर्ष करती थी। किन्तु जब से वे ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी, उनकी किस्मत बदल गई। आजीविका मिशन समूह के माध्यम से तीन बार मिले ऋण से आज जहां उन्होने अपनी कच्ची झोपड़ी को पक्का मकान में बदल दिया है। वही इस घर में पक्की दुकान पर बैठक सफलता पूर्वक अपनी मनिहारी की दुकान का संचालन करते हुए लेडिज कपड़ों को भी सिलने एवं बेचने का कार्य कर रही है। उनके इस कार्य में अब पति भी अपना हाथ बंटा रहे है। पत्नी के सिले हुए कपड़ों को वे अपनी मोटर सायकल से ले जाकर गांव-गांव फेरी लगाकर एवं हाट-बाजार में विक्रय कर रहे है। जिसके कारण उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हो रहा है।
पति-पत्नी की इस मेहनत से मिली सफलता को बच्चे भी अच्छी तरह से निभा रहे है। बड़ी पुत्री जहां एम.एस.सी कर रही है, तो छोटी पुत्री बी.एस.सी तो पुत्र ११वीं में पढ़ रहा है।

Friday, 18 November 2016

तन ही नहीं मन भी सुंदर, रेखा ने खुली आंखों से देखा सपना किया पूरा

खरगोन। सपने तो हर कोई देखता है और उन्हें पूरे करने के भी लगातार प्रयास करता है। मगर कुछ ही शख्स होते है, जो अपने सपनों को पूरा कर पाते है। उनमें से एक है ग्राम ठीबगांव की श्रीमती रेखा ओमप्रकाश सावल्दे। उन्होंने भी अपने परिवार की आय ब$ढाने के लिए रोजगार के सपने देखे। आखिरकार उन्हें किसी अखबार में स्टार स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान का विज्ञापन देखा और यहीं से सपना पूरा करने की शुरूआत हुई। श्रीमती सावल्दे ने २८ अक्टूबर से २१ दिनों का सिलाई प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण में पूरी लगन के साथ टेलरिंग के सभी पहलू सिखे। स्टार स्वरोजगार प्रशिक्षण द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में आए प्रशिक्षणार्थियों को ऋण और अनुदान योजनाओं में दिलाने की सहायता की जाती है। इसी प्रयास में मुद्रा योजनांतर्गत श्रीमती सावल्दे को एक माह के भीतर ही जैतापुर की बैंक ऑफ इंडिया शाखा से 50 हजार रूपए का लोन प्रदान किया। प्राप्त किए गए लोन से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और प्रशिक्षण में दिए गए हुनर और रोजगार के लिए दी गई सलाह के मुताबिक उन्होंने बाजार में उन व्यापारियों से करार किया, जो रेडिमेड कपड़े सिलवाते है। इसी प्रयास में उन्हें शासकीय क्रमांक एक व दो स्कूल की यूनिफार्म बनाने का अवसर मिला और देखते ही देखते उन्होंने 10 से 12 हजार यूनिफार्म बनाकर 20 हजार का शुद्घ मुनाफा लिया। साथ ही वे बाजार के सप्लायरों से करार कर ब्लाउज व पेटीकोट थोक में बनाने का कार्य निरंतर करती रही। 12 सौ रुपए प्रतिमाह की किश्त अदायगी भी निरंतर करती हुई अपने प्रयासों को जारी रखा और व्यक्तिगत ऋ ण लेकर सेंटिंग का कार्य भी प्रारंभ किया। निर्माण कार्यों में उपयोग की जाने वाली सेंटिंग सामग्री किराए पर भी देना प्रारंभ कर दिया। साथ ही अन्य घरेलू महिलाओं को वे स्वयं ब्लाउज व पेटीकोट का प्रशिक्षण देकर रोजगार प्रदान किया है। उनके पास लक्ष्मी सावल्दे, रजनी घोसले व मंजूबाला रोकड़े को प्रति नग के आधार पर रोजगार काम उपलब्ध कराती है। वे एक दिन में बालिकाओं की 50 नग यूनिफार्म और अन्य अंडरगारमेंट बनाने का कार्य कर पाती है। आज रेखा खरगोन पटेल नगर में रहकर ही अपना गृह उद्योग चला रही है और साथ ही अपने तीन बच्चों को अच्छी स्कूलों में शिक्षा भी दिलवा पा रही है।

तन ही नहीं मन भी सुंदर, रेखा ने खुली आंखों से देखा सपना किया पूरा

खरगोन। सपने तो हर कोई देखता है और उन्हें पूरे करने के भी लगातार प्रयास करता है। मगर कुछ ही शख्स होते है, जो अपने सपनों को पूरा कर पाते है। उनमें से एक है ग्राम ठीबगांव की श्रीमती रेखा ओमप्रकाश सावल्दे। उन्होंने भी अपने परिवार की आय ब$ढाने के लिए रोजगार के सपने देखे। आखिरकार उन्हें किसी अखबार में स्टार स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान का विज्ञापन देखा और यहीं से सपना पूरा करने की शुरूआत हुई। श्रीमती सावल्दे ने २८ अक्टूबर से २१ दिनों का सिलाई प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण में पूरी लगन के साथ टेलरिंग के सभी पहलू सिखे। स्टार स्वरोजगार प्रशिक्षण द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में आए प्रशिक्षणार्थियों को ऋण और अनुदान योजनाओं में दिलाने की सहायता की जाती है। इसी प्रयास में मुद्रा योजनांतर्गत श्रीमती सावल्दे को एक माह के भीतर ही जैतापुर की बैंक ऑफ इंडिया शाखा से 50 हजार रूपए का लोन प्रदान किया। प्राप्त किए गए लोन से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और प्रशिक्षण में दिए गए हुनर और रोजगार के लिए दी गई सलाह के मुताबिक उन्होंने बाजार में उन व्यापारियों से करार किया, जो रेडिमेड कपड़े सिलवाते है। इसी प्रयास में उन्हें शासकीय क्रमांक एक व दो स्कूल की यूनिफार्म बनाने का अवसर मिला और देखते ही देखते उन्होंने 10 से 12 हजार यूनिफार्म बनाकर 20 हजार का शुद्घ मुनाफा लिया। साथ ही वे बाजार के सप्लायरों से करार कर ब्लाउज व पेटीकोट थोक में बनाने का कार्य निरंतर करती रही। 12 सौ रुपए प्रतिमाह की किश्त अदायगी भी निरंतर करती हुई अपने प्रयासों को जारी रखा और व्यक्तिगत ऋ ण लेकर सेंटिंग का कार्य भी प्रारंभ किया। निर्माण कार्यों में उपयोग की जाने वाली सेंटिंग सामग्री किराए पर भी देना प्रारंभ कर दिया। साथ ही अन्य घरेलू महिलाओं को वे स्वयं ब्लाउज व पेटीकोट का प्रशिक्षण देकर रोजगार प्रदान किया है। उनके पास लक्ष्मी सावल्दे, रजनी घोसले व मंजूबाला रोकड़े को प्रति नग के आधार पर रोजगार काम उपलब्ध कराती है। वे एक दिन में बालिकाओं की 50 नग यूनिफार्म और अन्य अंडरगारमेंट बनाने का कार्य कर पाती है। आज रेखा खरगोन पटेल नगर में रहकर ही अपना गृह उद्योग चला रही है और साथ ही अपने तीन बच्चों को अच्छी स्कूलों में शिक्षा भी दिलवा पा रही है।